रघुराज सिंह संवाददाता
चुनाव में लड़ने फिर से भैया जी आ रहे,
बड़े बड़े पोस्टर कट आउट वो लगा रहे,
वो नव युवक की नई नई टोली बना रहे,
पैसा बांटने को नई नई झोली सिला रहे।।
चुनाव लड़ने......
चाचा चाची भैया भाभी सबको बुला रहे,
बोलते न थे जिससे उसी को यूं बुला रहे,
बाटी चोखा मुर्गा मछली बकरा खिला रहे,
सबको बुला बुला के आज चाय पिला रहे।
चुनाव लड़ने......
वो मुहब्बत की नई परिभाषा बता रहे,
अपना न था अब तक रिश्ता बता रहे,
झुक झुक छोटे बड़े सबका पैर छू के,
दिल से दिल जोड़ के रिश्ता बना रहे।।
चुनाव लड़ने......
घायल है फिर भी दिन रात चल रहे है,
सब कुछ लुटा चुके है और लुटा रहे है,
है कितना सोना चांदी लोहा और पत्थर,
जो सब लुटे है तुझसे वहीं दिखा रहे है।।
चुनाव लड़ने......
अबतक सबके लिए कुर्सियां बिछा रहे,
प्रधान पद के लिए वो भी चुनाव लड़ रहे,
अंधेरे में पैदा हुए और आजतक जी रहे,
प्रधान बन सूरज को दिया दिखाने आ रहे।
चुनाव लड़ने......
नरसिंह यादव,स्वरचित मूल कविता