वीरेंद्र कुमार संवाददाता
सोनभद्र(विंढमगंज)। झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे बैरखड़ गांव में आदिवासी समुदाय ने अपनी प्राचीन परंपरा के अनुसार पांच दिन पूर्व ही होलिका दहन कर होली का पर्व मनाया। गांव के लोगों का मानना है कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और इसमें उनकी संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है। निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल के अनुसार अन्य स्थानों के मुकाबले यहां पहले होली मनाने की परंपरा काफी पुरानी है, जिसे आज भी समाज पूरी आस्था के साथ निभा रहा है।
• अनहोनी के बाद बदली परंपरा, आज भी कायम है विश्वास
ग्रामीणों के अनुसार पूर्वजों के समय होली पर्व के दौरान बड़ी धन-जन हानि और महामारी जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। इसके बाद समुदाय के बुजुर्गों और बैगा ने सलाह दी कि नियत तिथि से चार-पांच दिन पहले होली मनाई जाए। तभी से गांव में यह परंपरा शुरू हुई और अब तक जारी है। पूर्व प्रधान अमर सिंह गौड़, मनरूप गहंवां, छोटेलाल सिंह, रामकिशुन सिंह और लाल मोहन गोंड ने बताया कि होलिका दहन की रस्म बैगा या बिरादरी के मनोनीत व्यक्ति द्वारा “संवत डाड़” स्थल पर कराई जाती है। अगले दिन अवशेष उड़ाते हुए पूरे दिन रंग खेला जाता है और इष्ट देव की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती