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  रघुराज सिंह संवाददाता

• मोह-माया के बंधन से मुक्ति के लिए आवश्यक है निष्कपट भक्ति : पंडित नंदकिशोर पांडेय

बीजपुर(सोनभद्र)। ग्राम पंचायत डोडहर पुनर्वास-2 में आरडी दुबे के यहां आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस परम पूज्य पंडित नंदकिशोर जी पांडेय ने भक्ति, वैराग्य और ईश्वर प्राप्ति के आध्यात्मिक रहस्यों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार अंधकार के बिना प्रकाश का वास्तविक बोध नहीं होता, उसी प्रकार निर्गुण के ज्ञान के बिना सगुण स्वरूप की अनुभूति संभव नहीं है। श्रीमद्भागवत का मर्म समझाते हुए उन्होंने बताया कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक होता है, जब उसका मन सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर परमात्मा की भक्ति में लीन हो। उन्होंने वैराग्य की चार परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए बताया कि मां के गर्भ में, धर्मग्रंथों का श्रवण करते समय, रोगग्रस्त अवस्था में और श्मशान भूमि में मनुष्य को संसार की नश्वरता का बोध होता है, लेकिन परिस्थितियां बदलते ही वह फिर मोह-माया में उलझ जाता है।


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पंडित नंदकिशोर जी ने कहा कि केवल वैराग्य की भावना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण में उतारना भी जरूरी है। ईश्वर प्राप्ति का सर्वोपरि साधन भक्ति है और जब तक मन निर्मल, निष्कपट एवं अहंकाररहित नहीं होगा, तब तक सच्ची भक्ति का भाव जागृत नहीं हो सकता। उन्होंने श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रभु का स्मरण एवं आराधना करने का संदेश दिया। कथा से अभिभूत मुख्य यजमान रुद्रदेव दुबे ने कहा कि पंडित जी के श्रीमुख से कथा श्रवण करना अलौकिक अनुभूति प्रदान कर रहा है और उनकी वाणी में मां सरस्वती का साक्षात वास प्रतीत होता है। वहीं राजकुमारी दुबे ने कहा कि उनकी अमृतमयी वाणी से भगवान की लीलाओं का श्रवण करना परम सौभाग्य है, जिससे मन श्रद्धा और भक्ति से भर उठता है।



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